मुगलसराय/चंदौली। चंदौली जिले के पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर (मुगलसराय) के कुढ़कला इलाके में जिला प्रशासन की कथित बुलडोजर कार्रवाई की तैयारियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। माननीय उच्च न्यायालय ने एक अहम आदेश जारी करते हुए साफ किया है कि प्रशासन बिना ‘कानूनी प्रक्रिया’ (Due process of law) का पालन किए किसी भी नागरिक के आशियाने को जमींदोज नहीं कर सकता।

​हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद पीडीडीयू नगर के कुढ़कला और पश्चिमी बाजार से सटे इलाकों के प्रभावित परिवारों ने बड़ी राहत की सांस ली है।

​क्या है पूरा मामला?

​यह मामला नगर पालिका परिषद पीडीडीयू नगर (मुगलसराय) के ग्राम कुढ़कला (परगना मवई) के आराजी नंबर 38/1 से जुड़ा है। यहाँ के स्थानीय निवासी विजय कुमार और 21 अन्य लोगों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट याचिका (Writ – C No. 19707 of 2026) दाखिल की थी।

  • याचिकाकर्ताओं का दावा: स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे इस जमीन के वैध मालिक हैं। यूपी जमींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950 के बाद यह जमीन जमींदार के पक्ष में तय हुई थी, जिससे उन्होंने बाकायदा रजिस्टर्ड सेल डीड (बैनामा) के जरिए इसे खरीदा था। वे सालों से यहाँ शांतिपूर्ण और कानूनी रूप से रह रहे हैं।
  • प्रशासन का तर्क: वहीं दूसरी ओर, सरकारी वकील ने कोर्ट में दलील दी कि आराजी नंबर 38/1 की यह जमीन असल में खाली है और इसका उपयोग सरकारी सड़क के रूप में किया जा रहा है। प्रशासन का दावा था कि स्थानीय लोगों को पहले ही नोटिस दिए जा चुके हैं।

​हाईकोर्ट ने पकड़ी प्रशासन की चूक, दिए सख्त निर्देश

​जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रशांत की खंडपीठ ने जब मामले से जुड़े दस्तावेजों और सरकारी दावों की पड़ताल की, तो प्रशासन की बड़ी लापरवाही सामने आई। कोर्ट ने पाया कि सरकारी रिकॉर्ड यह साबित करने में नाकाम रहे कि प्रभावित लोगों को नोटिस सही तरीके से तामील (Serve) कराए गए थे या नहीं।

​इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए माननीय न्यायालय ने याचिका को निस्तारित करते हुए प्रशासन को निम्नलिखित सख्त निर्देश जारी किए:

  1. बिना कानूनी प्रक्रिया के तोड़फोड़ पर रोक: कोर्ट ने सरकारी पक्ष के उस बयान को रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें कहा गया कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के कोई भी घर नहीं गिराया जाएगा।
  2. नए सिरे से देना होगा फ्रेश नोटिस: कोर्ट ने आदेश दिया है कि किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या डिमोलिशन ड्राइव शुरू करने से पहले, प्रशासन को सभी प्रभावित पक्षों को नए सिरे से (Fresh Notices) नोटिस तामील कराना होगा।
  3. सुनवाई का पूरा मौका: सिर्फ नोटिस देना काफी नहीं होगा। नोटिस का जवाब मिलने के बाद सक्षम प्राधिकारी को प्रभावित मकान मालिकों को व्यक्तिगत रूप से सुनवाई का उचित अवसर (Opportunity of hearing) देना होगा।
  4. सबूत साझा करने के आदेश: प्रशासन जिस भी दस्तावेज या सर्वे के आधार पर कार्रवाई का मन बना रहा है, वह सारी सामग्री पहले याचिकाकर्ताओं को सौंपनी होगी, ताकि वे अपनी बेगुनाही के सबूत पेश कर सकें।

​स्थानीय स्तर पर फैसले के मायने

​मुगलसराय और आसपास के इलाकों में पिछले कुछ समय से बुनियादी ढांचा विकास और सड़क चौड़ीकरण को लेकर प्रशासनिक हलचल तेज है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह आदेश उन सभी लोगों के लिए एक नजीर बन गया है, जो प्रशासनिक मनमानी के डर के साए में जी रहे थे। अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि विकास की आड़ में नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ की अनदेखी कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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